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Alankar Kise Kahate Hain अलंकार किसे कहते है?

Alankar Kise Kahate Hain अलंकार किसे कहते है?

Alankar Kise Kahate Hain | अलंकार किसे कहते है | Alankar in Hindi | अलंकार इन हिंदी

हिंदी भाषा के शब्दों को उनके सही रूप में समझने के लिए व्याकरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और व्याकरण की भूमिका में अलंकार सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है।

इसलिए व्याकरण से जुड़ी सभी चीजों को सीखने के साथ बच्चों को अलंकार का भी ज्ञान होना अति आवश्यक है, क्योंकि अलंकार के बिना हिंदी व्याकरण पूर्ण नहीं हो सकती।

आज के इस लेख में हम अलंकार से जुड़ी सभी चीजों के बारे में जानेंगे कि अलंकार क्या होता है? (Alankar Kise Kahate Hain) इसके कितने प्रकार है? अलंकार के बीच मुख्य भेद क्या होते है? उम्मीद करता हूँ इस लेख के माध्यम से आपको अलंकार के बारे में पूरी जानकारी मिल जाएगी।

Alankar Kise Kahate Hain

अलंकार किसे कहते है? (Alankar Kise Kahate Hain) –

आचार्य वामन के अनुसार – “जो किसी वस्तु को अलंकृत करे, वह अलंकार है – अलड्कृतिलक्ड़ारः” जिस प्रकार आभूषण स्वर्ण से बनते है ठीक उसी प्रकार अलंकार सुवर्ण अर्थात् सुंदर वर्णों से बनते है।

दूसरे शब्दों में – “काव्य की शोभा बढ़ाने वाले सुंदर वर्णों को ही अलंकार कहा जाता है”

काव्यशास्त्र के आरंभिक काल में “अलंकार” का प्रयोग इसी अर्थ में हुआ है, इसके अतिरिक्त इस शब्द का एक और अर्थ लिया जाता था। संस्कृत में ‘अलंकार’ शब्द का व्यवहार साहित्य के शास्त्रपक्ष में हुआ है।

अलंकार शब्द, दो शब्दों से के संयोग से बना है – ‘अलम’ + ‘कार’ यहाँ पर ‘अलम’ का अर्थ है आभूषण तथा कार का अर्थ है धारण करना।

इसको कुछ इस प्रकार समझ जा सकता है, कि जिस प्रकार कोई स्त्री अपने सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए आभूषण का धारण करती है, ठीक उसी तरह भाषा की सुंदरता को बढ़ाने के लिए काव्य में अलंकार का प्रयोग किया जाता है।

संकीर्ण अर्थ में काव्यशरीर, अर्थात भाषा को शब्दार्थ से सुसज्जित तथा सुंदर बनाने वाले चमत्कारपूर्ण मनोरंजक ढंग को अलंकार कहते है।

अंग्रेजी में भी अलंकार मौजूद होता है, जिसे Figure of Speech के नाम से जाना जाता है, तथा इन दोनों ही भाषाओं में इसका प्रमुख कार्य है ‘काव्य की शोभा बढ़ाना’।

काव्य की शोभा बढ़ाने के लिए अलंकार का प्रयोग कई तरह से किया जाता है, शब्द की आवृति को बढ़ या घटाकर, शब्द युग्मों का प्रयोग करके, निर्जीव वस्तु को सजीव कहकर पुकारने से अथवा किसी की तुलना या महिमा के माध्यम से किया जा सकता है।

हिंदी साहित्य में अलंकार का प्रयोग करने कहीं पर शब्दों में किया जाता है तो कहीं पर अर्थों में इसका प्रयोग किया जाता है, अपने प्रयोग के अनुसार ही इसके भेद भी बताये गए है।

पत्र लेखन भी हिंदी भाषा में एक महत्वपूर्ण टॉपिक है, लगभग सभी बोर्ड की परीक्षाओं में पत्र लेखन से सवाल जरूर पूछे जाते है, हिंदी मे एप्लीकेशन कैसे लिखे Hindi Me Application Kaise Likhe इसके बारे में भी जरूर पढ़ें।

अलंकार के प्रकार –

अलंकार किसे कहते है, ये हमने जान लिया है…. अलंकार मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते है, 1. शब्दालंकार, 2. अर्थालंकार, 3. उभयालंकार।

आमतौर पर सिलेबस में दो ही अलंकार पढ़ाए जाते है, इसलिए हम इन दो अलंकारों के बारे में जानेंगे –

Alankar Kise Kahate Hain

शब्दालंकार –

काव्य में जहां पर शब्दों के प्रयोग से काव्य के सौन्दर्य में वृद्धि होती है उसे शब्दालंकार कहा जाता है, काव्य में शब्दों के चतुराई से प्रयोग किया जाता है, जिससे शब्द तो बदल जाते है लेकिन उनका अर्थ समान रहता है।

शब्दालंकार मुख्यतः तीन प्रकार के होते है, A. अनुप्रास अलंकार, B. यमक अलंकार और C. श्लेष अलंकार, आगे हमने इन तीनों अलंकारों के बारे में बात की है –

1. अनुप्रास अलंकार –

जब किसी वाक्य में एक से ज्यादा बार किसी वर्ण की आवृति हो तो उसे अनुप्रास अलंकार कहते है, उदाहरण –

मुदित महीपति मंदिर आए।

सेवक सचिव सुमंत्र बुलाए।।

इस वाक्य में हम देख सकते है कि इसके पहले पद में ‘म’ वर्ण की और दूसरे पद में ‘स’ वर्ण की आवृति एक से ज्यादा बार हुई है, इस आवृति के कारण पद में संगीतमयता आ गई है।

अनुप्रास अलंकार के कई भाग होते है, जो कुछ इस प्रकार से है –

(a.) छेकानुप्रास – जब किसी वाक्य में स्वरूप और क्रम से अनेक व्यंजनों की आवृति एक बार हो, तो वहाँ पर छेकानुप्रास होता है।

छेकानुप्रास में व्यंजन वर्णों का क्रम उसी क्रम में होता है जैसे – ‘रस’ और ‘सर’ में छेकानूपर है है, यदि यहाँ पर ‘सर’ – ‘सर’ की आवृति होती है तो यह छेकानुप्रास होगा, चतुर व्यक्तियों को यह अलंकार विशेष प्रिय है।

छेकानुप्रास के बारे में महाकवि देव ने इसका एक अति सुंदर उदाहरण दिया है –

रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै

साँस भर आँसू भरि कहत दई दई।।

इस वाक्य में ‘रीझि रीझि’, ‘रहसि रहसि’, ‘हँसि-हँसि’ और ‘दई-दई’ में छेकानुप्रास है, क्योंकि व्यंजनवर्णों की आवृत्ति उसी क्रम और स्वरूप में हुई है।

(b.) वृत्त्यनुप्रास — जब किसी वाक्य में एक व्यंजन की आवृत्ति एक या अनेक बार हो, वहाँ वृत्त्यनुप्रास होता है, रस कर अनुकूल वर्णों की योजना को वृत्ति कहते है, इसका उदाहरण इस प्रकार है –

सपने सुनहले मन भाए

यदि हम प्रस्तुत वाक्य पर नजर डालें तो देखते है कि यहाँ ‘स’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है।

छेकानुप्रास और वृत्त्यनुप्रास का अंतर-

छेकानुप्रास में अनेक व्यंजनों की एक बार स्वरूपतः और क्रमशः आवृत्ति होती है, इसके विपरीत, वृत्त्यनुप्रास में अनेक व्यंजनों की आवृत्ति एक बार केवल स्वरूपतः होती है, क्रमतः नहीं।

यदि एक से अधिक व्यंजनों की आवृत्ति उनके अपने स्वरूप में और क्रम से भी होती है, तो एक बार नहीं, अनेक बार भी हो सकती है।

(c.) लाटानुप्रास – जब एक शब्द या वाक्यखंड की आवृत्ति उसी अर्थ में हो, पर तात्पर्य या अन्वय में भेद हो, तो वहाँ ‘लाटानुप्रास’ होता है। यह यमक का ठीक उल्टा है, इस अलंकार में मात्र शब्दों की आवृति न होकर तत्पर्यमात्र के भेद से शब्द और अर्थ दोनों की आवृति होती है।

इसमें मात्र शब्दों की आवृत्ति न होकर तात्पर्यमात्र के भेद से शब्द और अर्थ दोनों की आवृत्ति होती है। जैसे—

सही अर्थों में सच्चा मनुष्य वही है जो किसी मनुष्य के लिए मरे।

प्रस्तुत वाक्य को देखते है तो इसमें ‘मनुष्य’ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। दोनों का अर्थ ‘आदमी’ है। पर तात्पर्य या अन्वय में भेद है। वाक्य में पहला मनुष्य कर्ता है और दूसरा मनुष्य संप्रदान।

2. यमक अलंकार –

जब किसी वाक्य में किसी एक ही शब्द की एक से अधिक बार हो और उनके अर्थ अलग-अलग हो तो वहाँ पर यमक अलंकार होता है, इसको आसानी से याद रखने के लिए इस तरह समझ सकते है कि यमक का अर्थ जोड़ा होता है।

उदाहरण के तौर पर –

तीन बेर खाती थी।

वो तीन बेर खाती है॥

यहाँ पर इस वाक्य में पहले वाले बेर का अर्थ ‘समय’ है जबकि दूसरे वाले ‘बेर’ का अर्थ है खाने वाला बेर, इन दोनों के लिए एक ही शब्द है अतः यहाँ पर यमक अलंकार है।

3. श्लेष अलंकार –

जब किसी वाक्य में किसी शब्द से दो या दो से अधिक अर्थ निकलते है तो वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है, श्लेष का अर्थ होता है “चिपका हुआ” इस शब्द को ध्यान में रखने पर श्लेष अलंकार को आसानी से याद रखा जा सकता है।

श्लेष अलंकार में दो बातों का होना आवश्यक है, किसी भी शब्द के एक से अधिक अर्थ हो और वे एक से अधिक अर्थों के प्रकरण में अपेक्षित हो।

श्लेष अलंकार का उदाहरण –

माया महाठगिनि हम जानी।

तिरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै माधुरी बानी।

प्रस्तुत वाक्य में “तिरगुन” शब्द में शब्दश्लेष की रचना हुई है, जहां पर इसके दो अर्थ निकलते है जिसमें पहला है तीन गुण – सत्व, रजस्, तमस् और दूसरा अर्थ है तीन धागों वाली रस्सी।

तिरगुन के ये दोनों अर्थ दिए गए वाक्य में इसके नियम के अनुसार बिल्कुल ठीक बैठते है, क्योंकि इन सभी की संगति “महाठगिनि माया” से बैठाई गई है।

वक्रोक्ति अलंकार –

वक्रोक्ति का तात्पर्य है किसी अन्य अभिप्राय से कहे हुए वाक्य का किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा श्लेष अथवा काकु-उक्ति से अन्य अर्थ कल्पित किया जाना।

दूसरे शब्दों में कहें तो जहाँ पर वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का श्रोता अलग अर्थ निकाले उसे ही वक्रोक्ति अलंकार कहा जाता है।

जैसे – रोको, मत जाने दो |

रोको मत, जाने दो ||

देखने से तो ये दोनों वाक्य एक जैसे ही लग रहे है लेकिन इनके अर्थ बिल्कुल विपरीत है, पहले वाक्य में किसी को रोकने के लिए कहा जा रहा है लेकिन वहीं दूसरे वाक्य में व्यक्ति को जाने के लिए कहा जा रहा है।

वक्रोक्ति अलंकार दो प्रकार के होते है श्लेषवक्रोक्ति अलंकार और काकुवक्रोक्ति अलंकार।

अर्थालंकार –

काव्य में जहां पर अलंकार अर्थ के ऊपर पर आश्रित हो, वहां अर्थालंकार होता है, अर्थालंकार में शब्दों के परिवर्तन कर देने पर भी अर्थ में परिवर्तन नहीं होता है।

1. उपमा अलंकार –

दो वस्तुओं में समानधर्म के प्रतिपादन को उपमा कहते है, उपमा का अर्थ होता है – समता, तुलना या बराबरी।

इसे दूसरे शब्दों में कहें तो जब किसी वाक्य में एक ही वस्तु की तुलना एक समान गुणधर्म के आधार पर किसी दूसरी वस्तु से की जाती है तो वहाँ पर उपमा अलंकार होता है।

उदाहरण:- हरि पद कोमल कमल से

स्पष्टीकरण:- यहाँ भगवान के पैरों की तुलना कमल से की गयी है, मुख चाँद सा सुंदर है।

ऊपर के उदाहरण में मुख उपमेय है। अतः यहाँ उपमा अलंकार है।

उपमा अलंकार के लिए चार बातें आवश्यक है –

उपमेय – जिसकी उपमा दी जा रही हो या जिसका वर्णन हो रहा हो।

उपमान – जिससे उपमा दी जाए।

समानतावाचक पद – जैसे – ज्यों, सम, सा, सी, तुल्य, नाईं इत्यादि मौजूद हो।

इसके साथ ही वाक्य में उपमेय और उपमान के समान धर्म को व्यक्त करने वाला मौजूद शब्द।

2. रुपक अलंकार –

उपमेय व उपमान में अभिन्नता दिखाई देना ही रूपक अलंकार कहलाता है, उपमेय व उपमान के बीच गुणों की अत्यंत समानता के कारण उपमेय को ही उपमान बता दिया जाता है।

रुपक अलंकार की पहचान योजक का चिन्ह (-) के साथ उपमा अलंकार के वाचक शब्दों का प्रयोग ना होना, तथा वाक्य में बंदौ, महंत, भगवान के नाम इत्यादि शब्दों का लग कर आना तथा उसके साथ मुनि शब्द का जुड़ना, इसकी पहचान है।

बीती विभावरी जाग री अम्बर पनघटमें डुबोरही तारा घाट उषा नागरी।

यहाँ प्रस्तुत वाक्य में, तारा और उषा (जो उपमेय है) पर क्रमशः पनघट, घट और नागरी (जो उपमान है) का आरोप हुआ है। वाचक पद नहीं आए है और उपमेय तथा उपमान दोनों का साथ-साथ वर्णन हुआ है।

3. उत्प्रेक्षा अलंकार –

जब किसी वाक्य में उपमेय में उपमान की संभावना प्रकट की जाए तो वहां पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। उत्परक्ष अलंकार की पहचान वाक्य में आए – मनु ,मानहु, जनु, जनहु, जानो, मानो ,निश्चय , ईव, ज्यों तथा ज्वाला शब्दों से की जा सकती है।

तात्पर्य यह है कि उपमेय में उपमान को प्रबल रूप में कल्पना की आखों से देखने की प्रक्रिया को उत्प्रेक्षा कहते है, इसमें कवि की कल्पना साधारण ण होकर विलक्षण होती है।

फूले कास सकलं महि छाई । जानु बरखा रितु प्रकट बुढ़ाई ।।

यहाँ वर्षाऋतु के बाद शरदऋतु के आगमन का वर्णन हुआ है, शरदऋतु में खिले हुए फूल ऐसे मालूम होते हैं जैसे वर्षाऋतु का बुढ़ापा प्रकट हो गया हो।

यहाँ ‘कास कास के के फूल’ (उपमेय) में ‘वर्षाऋतु के बुढ़ापे’ (उपमान) की संभावित कल्पना की गई है। इस कल्पना से अर्थ का चमत्कार प्रकट होता है।

वस्तुतः, अंत में वर्षाऋतु की गति और शक्ति वृद्धावस्था की तरह एकदम शिथिल पड़ जाती है।

4. उपमेयोपमा –

किसी वाक्य में मौजूद उपमेय और उपमान को परस्पर उपमान और उपमेय बनाने की इस प्रक्रिया को “उपमेयोपमा” कहते है, इस तरह से इसमें दो तरह की भिन्न उपमाएं होती है।

जैसे – राम के समान शंभु, शंभु सम राम है।

प्रस्तुत वाक्य में हम देखते है कि दो उपमाएं एक साथ आई है, लेकिन दोनों उपमाओ के उपमेय और उपमान क्रमशः उपमेय और उपमान में परिवर्तित हो गए है।

5. अतिशयोक्ति –

जब किसी वाक्य में किसी का वर्णन् इतना बढ़ा चढ़ा कर किया जाए कि सीमा या मर्यादा का उल्लंघन हो जाए, वहाँ पर ‘अतिशयोक्ति अलंकार’ होता है।

बांधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से, मणिवाले फणियों का मुख, क्यों भर हुआ हीरों से॥

प्रस्तुत वाक्य में कवि के द्वारा मोतियों से भरी हुई प्रिय की मांग का वर्णन किया गया है, इस वाक्य में विधु या चंद्र से मुख का, काली जंजीरों से केश और मणिवाले फणियों से मोटि भरी मांग का बोध होता है।

6. उल्लेख अलंकार –

जब किसी वाक्य में किसी एक ही वस्तु का वर्णन अनेक प्रकार से किया जाए, वहाँ ‘उल्लेख अलंकार’ होता है।

उदाहरण के तौर पर – तू सौंदर्य है सुमन में, तू प्राण है पवन में, रूप है किरण में, विस्तार है गगन में।

7. विरोधाभास अलंकार –

जब किसी वाक्य में विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास दिया जाए, वहाँ ‘विरोधाभास अलंकार’ होता है।

उदाहरण के तौर पर – बैन सुन्या जबते मथुर, तबते सुनत न बैन

यहाँ ‘बैन सुन्या’ और ‘सुनत न बैन’ में विरोध दिखाई देता है, जबकि इसके पीछे का सच तो यह है कि दोनों में वास्तविक विरोध नहीं है, यह विरोध तो प्रेम की तन्मयता का एक सूचक है।

8. स्वभावोक्ति अलंकार –

किसी वस्तु के स्वाभाविक वर्णन को ‘स्वभावोक्ति अलंकार’ कहते हैं। यहाँ सादगी में चमत्कार रहता है। उदाहरण –

चितवनि भोरे भाय की, गोरे मुख मुसकानि। लगनि लटकि आली गरे, चित खटकति नित आनि।।

-बिहारीलाल

प्रस्तुत पड़ी में नायक, नायिका की सखी से कहता है कि उस नायिका की वह भोलेपन की चितवन, वह गोरे मुख की हँसी और वह लटक-लटककर सखी के गले लिपटना-ये चेष्टाएँ रोज माना मन में खटका करती हैं।

यहाँ नायिका के जिन आगिक व्यापारों का चित्रण हुआ है, वे सभी स्वाभाविक है, इसमें वस्तु, दृश्य अथवा व्यक्ति की अवस्थाओं या स्थितियों का उसके वास्तविक रूप में अंकन हुआ है।

9. दृष्टांत अलंकार –

जहाँ उपमेय और उपमान तथा उनके साधारण धर्मो में विंव प्रतिविंब का भाव हो, वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है।

उदाहरण के तौर पर – सुख-दुख के माधुर्य मिलन से यह जीवन हो परिपूर्ण, फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि में ओझल हो घन।।

प्रस्तुत काव्य में सुख-दुख और शशि तथा घन में बिंब प्रतिबिंब भाव है।

9. काव्यलिंग अलंकार –

किसी युक्ति से समर्थित की गई बात को काव्यलिंग अलंकार कहा जाता है, इस अलंकार में किसी बात के समर्थन में कोई न् कोई युक्ति या कर्ण अवश्य दिया जाता है, बिना ऐसा किए वाक्य की बातें अधूरी रह जाएंगी।

उदाहरण के तौर पर – कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय। उहि खाए बौरात नर, इहि पाए बौराय॥

धतूरा खाने से नशा होता है, लेकिन सुवर्ण अथवा सोना पाने से भी नशा होता है, यह बहुत ही अजीब बात है।

प्रस्तुत वाक्य में इसी बात का समर्थन किया गया हिय कि सोने में धतूरे से भी अधिक मादकता है, दोहे के उतरार्द्ध में इस कथन की पुष्टि हुई है, ‘धतुरा खाने से नशा चढ़ता है’ लेकिन सुवर्ण पाने से मद की वृद्धि होती है, यह कारण देकर पूर्वार्ध की समर्थनीय बात की पुष्टि होती है।

Note – वैसे तो अर्थालंकार के अंतर्गत 100 से भी अधिक अलंकार आते है, जिनमें सबको पढ़ पाना थोड़ा मुश्किल है, इसलिए कुछ ही अलंकार है जो पढ़ाए जाते है, अलग-अलग पाठ्यक्रमों में अलग-अलग अर्थालंकरों की संख्या हो सकती है, इसलिए यदि इस आर्टिकल में जिस किसी भी अलंकार के बारे में जानकारी नहीं दी गई है कृपया हमें कमेन्ट बॉक्स के माध्यम से जरूर बताएं, इसे अपडेट कर दिया जाएगा।

Summary –

दोस्तों, अलंकार किसे कहते है? (Alankar Kise Kahate Hain) इसके बारे में यह लेख आपको कैसा लगा हमें जरूर बताएं नीचे कमेन्ट बॉक्स में, यदि आपके पास इससे जुड़ा कोई सवाल या सुझाव हो तो उसे भी आप जरूर लिखें।

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About The Author –

Hello Friends, मेरा नाम Rakesh Kumar Sawant है, मैं एक डिजिटल कंटेन्ट क्रिएटर और www.TechEnter.in का Founder हूँ, इस ब्लॉग पर आपको योजना, टेक्नोलॉजी, टिप्स और ट्रिक्स, बैंकिंग, फाइनेंस, शेयर मार्केट, पैसे कमाने के तरीके, ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया और लाइफस्टाइल के साथ ही और भी ढेर सारी टॉपिक से जुड़ी बहुत सी जानकारीयां मिलेंगी, हर रोज कुछ नया सीखने के लिए हमारे ब्लॉग को विज़िट करें।

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