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पंडिता रमाबाई – Pandita Ramabai

पंडिता रमाबाई – Pandita Ramabai

जन्म – 23 अप्रैल 1858
मृत्यु – 5 अप्रैल 1922

पंडीता रमाबाई ( Pandita Ramabai )भारतीय ईसाई समाज सुधारिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता थी उन्हे महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के लिए कार्य करने के लिए जाना जाता है वह पंडिता की उपाधि से सम्मानित होने वाली पहली भारतीय महिला थी

पंडिता रमाबाई का जन्म 23 अप्रैल 1858 को मद्रास के एक ब्राह्मण परिवार में संस्कृत विद्वान अनंत शास्त्री डोंगरे के घर हुआ था उन्होंने अपने पिता से संस्कृत का ज्ञान भी प्राप्त किया।
उनके मत पिता की 1877 में मृत्यु हो गई उसके बाद उन्होंने अपने भाई के साथ पूरे भारत की यात्रा की और संस्कृत का प्रचार प्रसार किया , 1878 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में इन्हें संस्कृत के क्षेत्र में इनके ज्ञान और कार्य के लिए इन्हे  सरस्वती और पंडिता की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित किया।

पंडिता रमाबाई जन्म से ब्राह्मण थी लेकिन उन्होंने एक गैर ब्राह्मण (बिपिन बिहारी दास ) से विवाह किया। बिपिन बिहारी दास एक बंगाली वकील थे दोनों की एक पुत्री हुई जिसका नाम मनोरमा रखा गया, 1882 मे इनके पति की मृत्यु हो गई

पति की मृत्यु (1882) के बाद, रमाबाई पुणे चली गई जहाँ उन्होंने आर्य महिला समाज की स्थापना की जिसका उद्देश्य महिला शिक्षा के प्रति समाज को जागरूक करना और बाल विवाह से मुक्ति दिलाना था
वह 1883 मे मेडिकल और अंग्रेजी की शिक्षा लेने के लिए इंग्लैंड गई, बहरेपन के कारण उन्हे  मेडिकल से खारिज कर दिया गया था उन्होंने इंग्लैंड मे ही अपना धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया और उन्होंने बाइबल का मराठी मे अनुवाद भी किया ।
इसके बाद वे 1889 में भारत लौटीं और विधवाओं के लिए शारदा सदन की स्थापना की और  बाद में कृपा सदन नामक एक और महिला आश्रम भी बनाया। उन्होंने ठुकराई गई महिलाओं और बच्चों की सहायता के लिए  मुक्ति मिशन शुरू किया।
सन् 1919 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें “कैसर-ए-हिंद” की उपाधि से सम्मानित किया।

5 अप्रैल, 1922 ई. को पंडिता रमाबाई का देहांत हो गया।

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